खजुराहो
मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग परीक्षा की दृश्टि से महत्वपुर्ण अध्याय :
मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के द्वारा आयोजित होने वाली अति महत्वपूर्ण परीक्षाओ की दृस्टि से खजुराहो जो की छतरपुर जिले के अंतर्गत एक प्राचीन ऎतिहासिक शहर है, जैसा की हम सभी जानते है मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओ में खजुराहो जिले से प्रश्न आना स्वाभाविक होता है इस हेतु मैं यहाँ महत्वपूर्ण तथ्यों को जो पूर्व में भी अनेको प्रतियोगी परीक्षाओ में देखने को मिलते है बताऊंगा जिनमे से आने वाली प्रतियोगी परीक्षाओ मे निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाएंगे। क्युकी इतिहास को हम २ पन्नो मे नहीं समेट सकते है एवं कई बार अलग अलग इतिहासकारो की राय भी अलग अलग ही होती है इसलिए मुझे भी इस अध्याय को तैयार करने के लिए यहाँ अलग अलग माध्यमों का उपयोग करना पढ़ा। जिससे सभी को सही तथ्यों से अवगत करवा सकु। तो आइये इस अति महत्वपूर्ण अध्याय को रोचकता के साथ एक कहानी के रूप मे अध्यन करते है। जिसके बाद आप सभी खजुराहो से सम्बंधित किसी भी प्रश्न का उत्तर आसानी से दे सकेंगे।
खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश में स्थित
एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है।
यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में
स्थित है। खजुराहो को प्राचीन काल में खजुरवाहक और खजूर वाहिका के नाम से भी जाना जाता था। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन
हिन्दू और जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए
पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह
से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा
दुनिया भर के आगन्तुक और पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने
के लिए निरंतर आते रहते है। हिन्दू कला और संस्कृति को
शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था। विभिन्न
कामक्रीडाओं को इन मंदिरों में बेहद खूबसूरती के उभारा गया है।
इतिहास
· खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल
पुराना है। यह शहर चंदेल साम्राज्य
की प्रथम राजधानी था। चंदेल वंशो और
खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे।
· चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने
वाले राजपूत राजा थे। वे अपने आप को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं
से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950
ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चंदेल राजाओं
द्वारा किया गया।
· मंदिरों
के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित
कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का
महत्व बना रहा।
· मध्यकाल के दरबारी कवि चंद्रबरदाई ने पृथ्वीराज रासो के महोबा
खंड में चंदेल की
उत्पत्ति का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि काशी के राजपंडित की पुत्री
हेमवती अपूर्व सौंदर्य की स्वामिनी थी। एक दिन वह गर्मियों की रात में कमल-पुष्पों
से भरे हुए तालाब में स्नान कर रही थी। उसकी सुंदरता देखकर भगवान चन्द्र उन पर मोहित
हो गए। वे मानव रूप धारणकर धरती पर आ गए और हेमवती का हरण कर लिया। दुर्भाग्य से
हेमवती विधवा थी। वह एक बच्चे की मां थी। उन्होंने चन्द्रदेव पर अपना जीवन नष्ट
करने और चरित्र हनन का आरोप लगाया।
· अपनी गलती के पश्चाताप के लिए चन्द्र
देव ने हेमवती को वचन दिया कि वह एक वीर पुत्र की मां बनेगी। चन्द्रदेव ने कहा कि
वह अपने पुत्र को खजूरपुरा ले जाए। उन्होंने कहा कि वह एक महान राजा बनेगा। राजा
बनने पर वह बाग और झीलों से घिरे हुए अनेक मंदिरों का निर्माण करवाएगा। चन्द्रदेव
ने हेमवती से कहा कि राजा बनने पर तुम्हारा पुत्र एक विशाल यज्ञ का आयोजन करगा
जिससे तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे। चन्द्र के निर्देशों का पालन कर हेमवती ने
पुत्र को जन्म देने के लिए अपना घर छोड़ दिया और एक छोटे-से गांव में पुत्र को
जन्म दिया।
· हेमवती का पुत्र चन्द्रवर्मन अपने पिता
के समान तेजस्वी, बहादुर और शक्तिशाली था। सोलह साल की
उम्र में वह बिना हथियार के शेर या बाघ को मार सकता था। पुत्र की असाधारण वीरता को
देखकर हेमवती ने चन्द्रदेव की आराधना की जिन्होंने चन्द्रवर्मन को पारस पत्थर भेंट
किया और उसे खजुराहो का राजा बनाया। पारस पत्थर से लोहे को सोने में बदला जा सकता
था।
· चन्द्रवर्मन ने लगातार कई युद्धों में
शानदार विजय प्राप्त की। उसने कालिंजर का विशाल किला बनवाया। मां के कहने पर
चन्द्रवर्मन ने तालाबों और उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों
का निर्माण करवाया और एक यज्ञ का आयोजन किया जिसने हेमवती को पापमुक्त कर दिया।
चन्द्रवर्मन और उसके उत्तराधिकारियों ने खजुराहो में अनेक मंदिरों का निर्माण
करवाया।
दर्शनीय स्थल
पश्चिमी
समूह
· जब ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने
खजुराहो के मंदिरों की खोज की है तब से मंदिरों के एक विशाल समूह को 'पश्चिमी समूह' के नाम से
जाना जाता है। यह खजुराहो के सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है।
· इस स्थान को युनेस्को ने 1986 में
विश्व विरासत की सूची में शामिल भी किया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब सारा विश्व
इसकी मरम्मत और देखभाल के लिए उत्तरदायी होगा। शिवसागर के नजदीक स्थित इन पश्चिम
समूह के मंदिरों के दर्शन के साथ अपनी यात्रा शुरू करनी चाहिए।
· एक ऑडियो हैडसेट 50 रूपये में टिकट बूथ
से 500 रूपये जमा करके प्राप्त किया जा सकता है।
· इसके अलावा दो सौ रूपये से तीन रूपये
के बीच आधे या पूरे दिन में चार लोगों के लिए गाइड सेवाएं भी ली जा सकती हैं।
खजुराहो को साइकिल के माध्यम से अच्छी तरह देखा जा सकता है। यह साइकिलें 20 रूपये
प्रति घंटे की दर से पश्चिम समूह के निकट स्टैंड से प्राप्त की जा सकती है।
· इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत
ज्यादा सजावट की गई है। यह सजावट यहां के शासकों की संपन्नता और शक्ति को प्रकट
करती है। इतिहासकारों का मत है कि इनमें हिन्दू देवकुलों के प्रति भक्ति भाव
दर्शाया गया है।
· देवकुलों के रूप में या तो शिव या
विष्णु को दर्शाया गया है। इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का मंदिर
है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठम के समान बैठा हुआ दिखाया गया है। चार फुट ऊंची
विष्णु की इस मूर्ति में तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह के रूप में दर्शाए गए
हैं। कहा जाता है कि कश्मीर के चम्बा क्षेत्र से इसे मंगवाया गया था।
· इसके तल के बाएं हिस्से में आमलोगों के
प्रतिदिन के जीवन के क्रियाकलापों, कूच करती
हुई सेना, घरेलू जीवन तथा नृतकों को दिखाया गया
है। मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक
वेदियां हैं। 954 ईसवीं में बने इस मंदिर का संबंध तांत्रिक संप्रदाय से है।
· इसका अग्रभाग दो प्रकार की मूर्तिकलाओं
से सजा है जिसके मध्य खंड में मिथुन या आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाता है।
मंदिर के सामने दो लघु वेदियां हैं। एक देवी और दूसरा वराह देव को समर्पित है।
विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर की चट्टान के एकल खंड में बनी है।
कुछ महत्वपूर्ण मंदिर एवं दार्शनिक स्थल निचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जिन्हे देख कर हम सभी यह अच्छे से याद रख सकते है की यह खजुराहो में स्थित है तथा परीक्षा मे आने पर हम इन्हे भलीभांति सही तरह से उत्तर दे सकते है।
तो आइये देखते कुछ महत्वपूर्ण मंदिर जो की खजुराहो में उपस्थित हैं।
लक्ष्मी मंदिर
वराह मंदिर
लक्ष्मण मंदिर
कंदरिया महादेव मंदिर
कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता के कारण प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण महान चन्देल राजा विद्याधर ने महमूद गजनवी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया था। लगभग 1050 ईसवीं में इस मंदिर को बनवाया गया। यह एक शैव मंदिर है। तांत्रिक समुदाय को प्रसन्न करने के लिए इसका निर्माण किया गया था। कंदरिया महादेव मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहां सर्वाधिक मिथुनों की आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियां और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थीं।
सिह मंदिर
यह मंदिर कंदरिया महादेव मंदिर और देवी जगदम्बा मंदिर के बीच बना है |
देवी जगदम्बा मंदिर
कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। जगदम्बा देवी का मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण 1000 से 1025 ईसवीं के बीच किया गया था। सैकड़ों वर्षों पश्चात यहां छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई थी इसी कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहां पर उत्कीर्ण मैथुन मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता शिल्प की विशेषता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।
सूर्य चित्रगुप्त मंदिर
खजुराहो में एकमात्र सूर्य मंदिर है जिसका चित्रगुप्त नाम है। चित्रगुप्त एक ही चबूतरे पर स्थित चौथा मंदिर है।
इसका निर्माण भी विद्याधर के काल
में हुआ था। इसमें भगवान सूर्य की सात फुट ऊंची प्रतिमा कवच धारण किए हुए स्थित
है। इसमें भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। मंदिर की अन्य विशेषता यह है
कि इसमें एक मूर्तिकार को काम करते हुए कुर्सी पर बैठा दिखाया गया है। इसके अलावा
एक ग्यारह सिर वाली विष्णु की मूर्ति दक्षिण की दीवार पर स्थापित है।
बगीचे के रास्ते में पूर्व की ओर पार्वती मंदिर स्थित है।
यह एक छोटा-सा मंदिर है जो विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को छतरपुर के
महाराजा प्रताप सिंह द्वारा 1843-1847 ईसवीं के बीच बनवाया गया था। इसमें पार्वती
की आकृति को गोह पर चढ़ा हुआ दिखाया गया है। पार्वती मंदिर के दायीं तरफ विश्वनाथ
मंदिर है जो खजुराहो का विशालतम मंदिर है। यह मंदिर शंकर भगवान से संबंधित है। यह
मंदिर राजा धंग द्वारा 999 ईसवीं में बनवाया गया था। चिट्ठियां लिखती अपसराएं, संगीत का कार्यक्रम और एक लिंगम को इस
मंदिर में दर्शाया गया है।
विश्वनाथ मंदिर
शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण विश्वनाम मंदिर का निर्माण काल सन् १००२- १००३ ई. है। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदरों में से एक है। इस मंदिर का नामाकरण शिव के एक और नाम विश्वनाथ पर किया गया है। मंदिर की लंबाई ८९' और चौड़ाई ४५' है। पंचायतन शैली का संधार प्रासाद यह शिव भगवान को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ- साथ गर्भगृह के केंद्र में नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है।
नंदी मंदिर
नन्दी मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के सामने बना है |
पार्वती मंदिर
प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम
शाम को इस परिसर में अमिताभ बच्चन की आवाज़
में लाईट एंड
साउंड कार्यक्रम
प्रद्रर्शित किया जाता है। यह कार्यक्रम खजुराहो के इतिहास को जीवंत कर देता है।
इस कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए भारतीय नागरिक से प्रवेश शुल्क ५० रूपये और
विदेशियों से २०० रूपये का शुल्क लिया जाता है। सितम्बर से फरवरी के बीच अंग्रेजी
में यह कार्यक्रम शाम ७ बजे से ७:५० तक होता है जबकि हिन्दी का कार्यक्रम रात आठ
से नौ बजे तक आयोजित किया जाता है। मार्च से अगस्त तक इस कार्यक्रम का समय बदल
जाता है। इस अवधि में अंग्रेजी कार्यक्रम शाम ७:३० -८:२० के बीच होता है। हिन्दी
भाषा में समय बदलकर ८:४० - ९:३० हो जाता है।
पूर्वी समूह
पूर्वी समूह के मंदिरों को दो विषम समूहों में बांटा गया
है। जिनकी उपस्थिति आज के गांधी चौक से आरंभ हो जाती है। इस श्रेणी के प्रथम चार
मंदिरों का समूह प्राचीन खजुराहो गांव के नजदीक है। दूसरे समूह में जैन मंदिर हैं
जो गांव के स्कूल के पीछे स्थित हैं। पुराने गांव के दूसरे छोर पर स्थित घंटाई
मंदिर को देखने के साथ यहां के मंदिरों का भ्रमण शुरू किया जा सकता है। नजदीक ही
वामन और जायरी मंदिर भी दर्शनीय स्थल हैं। 1050 से 1075 ईसवीं के बीच वामन मंदिर
का निर्माण किया गया था। विष्णु के अवतारों में इसकी गणना की जाती है। नजदीक ही
जायरी मंदिर हैं जिनका निमार्ण 1075-1100 ईसवीं के बीच माना जाता है। यह मंदिर भी
विष्णु भगवान को समर्पित है। इन दोनों मंदिरों के नजदीक ब्रह्मा मंदिर हैं जिसकी
स्थापना 925 ईसवीं में हुई थी। इस मंदिर में एक चार मुंह वाला लिंगम है। ब्रह्मा
मंदिर का संबंध ब्रह्मा से न होकर शिव से है।
वामन मंदिर
जावरी मंदिर
जैन मंदिर
इन मंदिरों का समूह एक कम्पाउंड में स्थित है। जैन मंदिरों
को दिगम्बर सम्प्रदाय ने बनवाया था। यह सम्प्रदाय ही इन मंदिरों की देखभाल करता
है। इस समूह का सबसे विशाल मंदिर र्तीथकर आदिनाथ को समर्पित है। आदिनाथ मंदिर
पार्श्वनाथ मंदिर के उत्तर में स्थित है। जैन समूह का अन्तिम शान्तिनाथ मंदिर
ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर में यक्ष दंपत्ति की आकर्षक
मूर्तियां हैं।
दक्षिणी समूह
चतुर्भुज मंदिर
संग्रहालय
दक्षिणी समूह
इस भाग में दो मंदिर हैं। एक भगवान शिव से संबंधित दुलादेव
मंदिर है और दूसरा विष्णु से संबंधित है जिसे चतुर्भुज मंदिर कहा जाता है। दुलादेव
मंदिर खुद्दर नदी के किनारे स्थित है। इसे 1130 ईसवी में मदनवर्मन द्वारा बनवाया
गया था। इस मंदिर में खंडों पर मुंद्रित दृढ़ आकृतियां हैं। चतुर्भुज मंदिर का
निर्माण 1100 ईसवीं में किया गया था। इसके गर्भ में 9 फुट ऊंची विष्णु की प्रतिमा
को संत के वेश में दिखाया गया है। इस समूह के मंदिर को देखने लिए दोपहर का समय
उत्तम माना जाता है। दोपहर में पड़ने वाली सूर्य की रोशनी इसकी मूर्तियों को आकर्षक
बनाती है।
चतुर्भुज
मंदिर
यह मंदिर जटकारा ग्राम से लगभग आधा किलोमीटर दक्षिण में
स्थित है। यह विष्णु मंदिर निरधार प्रकार का है। इसमें अर्धमंडप, मंडप, संकीर्ण
अंतराल के साथ- साथ गर्भगृह है। इस मंदिर की योजना सप्ररथ है। इस मंदिर का
निर्माणकाल जवारी तथा दुलादेव मंदिर के निर्माणकाल के मध्य माना जाता है। बलुवे
पत्थर से निर्मित खजुराहो का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव
दिखाई देता है। सामान्य रूप से इस मंदिर की शिल्प- कला अवनति का संकेत करती है।
मूर्तियों के आभूषण के रेखाकन मात्र हुआ है और इनका सूक्ष्म अंकन अपूर्ण छोड़ दिया
है। यहाँ की पशु की प्रतिमाएँ एवं आकृतियाँ अपरिष्कृत तथा अरुचिकर है। अप्सराओं
सहित अन्य शिल्प विधान रुढिगत हैं, जिसमें
सजीवता और भावाभिव्यक्ति का अभाव माना जाता है। फिर भी, विद्याधरों का अंकन आकर्षक और मन को
लुभाने वाली मुद्राओं में किया गया है। इस तरह यह मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के आधार
पर सबसे बाद में निर्मित दुलादेव के निकट बना माना जाता है।
दूल्हादेव मंदिर
यह मूलतः शिव मंदिर है। इसको कुछ इतिहासकार कुंवरनाथ मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माणकाल लगभग सन् १००० ई. है। मंदिर का आकार ६९ न् ४०' है। यह मंदिर प्रतिमा वर्गीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिर है। निरंधार प्रासाद प्रकृति का यह मंदिर अपनी नींव योजना में समन्वित प्रकृति का है। मंदिर सुंदर प्रतिमाओं से सुसज्जित है। इसमें गंगा की चतुर्भुज प्रतिमा अत्यंत ही सुंदर ढ़ंग से अंकित की गई है। यह प्रतिमा इतनी आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक है कि लगता है कि यह अपने आधार से पृथक होकर आकाश में उड़ने का प्रयास कर रही है। मंदिर की भीतरी बाहरी भाग में अनेक प्रतिमाएँ अंकित की गई है, जिनकी भावभंगिमाएँ सौंदर्यमयी, दर्शनीय तथा उद्दीपक है। नारियों, अप्सराओं एवं मिथुन की प्रतिमाएँ, इस तरह अंकित की गई है कि सब अपने अस्तित्व के लिए सजग है। भ्रष्ट मिथुन मोह भंग भी करते हैं, फिर अपनी विशेषता से चौंका भी देते हैं।
इस मंदिर के पत्थरों पर "वसल' नामक कलाकार का नाम अंकित किया हुआ मिला है। मंदिर के वितान गोलाकार तथा स्तंभ अलंकृत हैं और नृत्य करती प्रतिमा एवं सुंदर एवं आकर्षिक हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग योनि- वेदिका पर स्थापित किया गया है। मंदिर के बाहर मूर्तियाँ तीन पट्टियों पर अंकित की गई हैं। यहाँ हाथी, घोड़े, योद्धा और सामान्य जीवन के अनेकानेक दृश्य प्रस्तुत किये गए हैं। अप्सराओं को इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि वे स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं निर्बाध जीवन का प्रतीक मालूम पड़ती है।
इस मंदिर की विशेषता यह है कि अप्सरा टोड़ों में अप्साओं को दो- दो, तीन- तीन की टोली में दर्शाया गया है। मंदिर, मंण्डप, महामंडप तथा मुखमंडप युक्त है। मुखमंडप भाग में गणेश और वीरभद्र की प्रतिमाएँ अपनी रशिकाओं में इस प्रकार अंकित की गई है कि झांक रही दिखती है। यहाँ की विद्याधर और अप्सराएँ गतिशील हैं। परंतु सामान्यतः प्रतिमाओं पर अलंकरण का भार अधिक दिखाई देता है। प्रतिमाओं में से कुछ प्रतिमाओं की कलात्मकता दर्शनीय एवं सराहनीय है। अष्टवसु मगरमुखी है। यम तथा नॠत्ति की केश सज्जा परंपराओं से पृथक पंखाकार है।
मंदिर की जगती ५' उँची है। जगती को सुंदर एवं दर्शनीय बनाया गया है। जंघा पर प्रतिमाओं की पंक्तियाँ स्थापित की गई हैं। प्रस्तर पर पत्रक सज्जा भी है। देवी- देवता, दिग्पाल तथा अप्सराएँ छज्जा पर मध्य पंक्ति देव तथा मानव युग्लों एवं मिथुन से सजाया गया है। भद्रों के छज्जों पर रथिकाएँ हैं। वहाँ देव प्रतिमाएँ हैं। दक्षिणी भद्र के कक्ष- कूट पर गुरु- शिष्य की प्रतिमा अंकित की गई है।
शिखर सप्तरथ मूल मंजरी युक्त है। यह भूमि आम्लकों से सुसज्जित किया गया है। उरु: श्रृंगों में से दो सप्तरथ एक पंच रथ प्रकृति का है। शिखर के प्रतिरथों पर श्रृंग हैं, किनारे की नंदिकाओं पर दो- दो श्रृंग हैं तथा प्रत्येक करणरथ पर तीन- तीन श्रृंग हैं। श्रृंग सम आकार के हैं। अंतराल भाग का पूर्वी मुख का उग्रभाग सुरक्षित है। जिसपर नौं रथिकाएँ बनाई गई हैं, जिनपर नीचे से ऊपर की ओर उद्गमों की चार पंक्तियाँ हैं। आठ रथिकाओं पर शिव- पार्वती की प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं। स्तंभ शाखा पर तीन रथिकाएँ हैं, जिनपर शिव प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं, जो परंपरा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु से घिरी हैं। भूत- नायक प्रतिमा शिव प्रतिमाओं के नीचे हैं, जबकि विश्रांति भाग में नवग्रह प्रतिमाएँ खड़ी मुद्रा में हैं। इस स्तंभ शाखा पर जल देवियाँ त्रिभंगी मुद्राओं में है। मगर और कछुआ भी यहाँ सुंदर प्रकार से अंकित किया गया है। मुख प्रतिमाएँ गंगा- यमुना की प्रतीक मानी जाती है। शैव प्रतिहार प्रतिमाओं में एक प्रतिमा महाकाल भी है, जो खप्पर युक्त है।
मंदिर के बाहरी भाग की रथिकाओं में दक्षिणी मुख पर नृत्य मुद्रा में छः भुजा युक्त भैरव, बारह भुजायुक्त शिव तथा एक अन्य रथिका में त्रिमुखी दश भुजायुक्त शिव प्रतिमा है। इसकी दीवार पर बारह भुजा युक्त नटराज, चतुर्भुज, हरिहर, उत्तरी मुख पर बारह भुजा युक्त शिव, अष्ट भुजायुक्त विष्णु, दश भुजा युक्त चौमुंडा, चतुर्भुज विष्णु गजेंद्रमोक्ष रूप में तथा शिव पार्वती युग्म मुद्रा में है। पश्चिमी मुख पर चतुर्भुज नग्न नॠति, वरुण के अतिरिकत वृषभमुखी वसु की दो प्रतिमाएँ हैं। उत्तरी मुख पर वायु की भग्न प्रतिमा के अतिरिक्त वृषभमुखी वसु की तीन तथा चतुर्भुज कुबेर एवं ईशान की एक- एक प्रतिमा अंकित की गई है।
कालिंजर एवं अजयगढ दुर्ग
कई सौ साल पहले जब खजुराहो चंदेला राजवंश के हाथ में था उस वक्त विन्द्य पर्वतों के बीच में अजयगढ़ के किले का निर्माण किया गया था। किले के पास से ही बहने वाली केन नदी को देखना न भूलें। ऐसी मान्यता है कि जब चंदेला राजवंश अपनी समाप्ति के कगार पर था उस वक्त इस किले का निर्माण करवाया गया था।
खजुराहो में मंदिरों का समूह है जो हिंदू देवी देवताओं को समर्पित है। हालांकि इन मंदिरों में कई मूर्तियां और प्रतिमाएं ऐसी भी हैं जो सेन्शुअल और इरॉटिक हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि भले ही लोग इसे सिर्फ इरॉटिक मूर्तियों के लिए जानते हों लेकिन इन मंदिरों में सिर्फ 10 प्रतिशत मूर्तियां कामुक हैं। मंदिर को 3 ग्रुप में बांटा गया है- पश्चिम, पूर्व और दक्षिण। आफ चाहें तो आदिनाथ मंदिर, मतांगेश्वर मंदिर, कंदारिया महादेव मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, देवी जगदंबा मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और ब्रह्म मंदिर भी जा सकते हैं।
पन्ना नैशनल पार्क
अगर आपको हीरा पसंद है तो निश्चित तौर पर आपने मध्य प्रदेश की पन्ना की खदानों के बारे में सुना होगा। इसी इलाके में मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध पन्ना नैशनल पार्क है जहां जानवरों की कई प्रजातियां पायी जाती हैं। खजुराहो के पास का यह बेहद फेमस डेस्टिनेशन है। पन्ना, खजुराहो से महज 57 किलोमीटर दूर है। ऐसे में अगर आप नेचर लवर हैं और वाइल्ड लाइफ देखने में दिलचस्पी रखते हैं तो खजुराहो के पास स्थित पन्ना नैशनल पार्क जा सकते हैं।
रानेह वॉटरफॉल
अगर आप कुछ अडवेंचरस देखने और करने को बेताब हैं तो पहुंच जाइए रानेह वॉटरफॉल। पहाड़ों और घने जंगलों के बीच से बहते इस झरने को देखना अपने आप में एक ऐसा एक्सपीरियंस है जिसे आप जीवनभर याद रखेंगे और अगर आप सूर्यास्त के वक्त यहां पहुंचेंगे तब तो यहां की प्राकृतिक खूबसूरती के क्या कहने...
आवागमन
खजुराहो जाने के लिए अपनी सुविधा के अनुसार वायु, रेल या सड़क परिवहन को अपनाया जा सकता है।
वायु मार्ग
खजुराहो वायु मार्ग द्वारा दिल्ली , वाराणसी , आगरा , काठमांडू से जुड़ा हुआ हैं। खजुराहो हवाई अड्डा, शहर से तीन किलोमीटर दूर है।
रेल मार्ग
खजुराहो रेलवे स्टेशन से दिल्ली,आगरा,जयपुर,उदयपुर,वाराणसी,भोपाल, इन्दौर,उज्जैन के लिए रेल सेवा उपलब्ध है। दिल्ली और मुंबई से आने वाले पर्यटकों के लिए झांसी भी सुविधाजनक रेलवे स्टेशन है। जबकि चेन्नई और वाराणसी से आने वालों के लिए सतना अधिक सुविधाजनक होगा। नजदीकी और सुविधाजनक रेलवे स्टेशन से टैक्सी या बस के माध्यम से खजुराहो पहुंचा जा सकता है। सड़कों की स्थिति बहुत अच्छी है।
सड़क मार्ग
खजुराहो महोबा, हरपालपुर, छतरपुर, सतना, पन्ना, झांसी, आगरा, ग्वालियर, सागर, जबलपुर, इंदौर, भोपाल, वाराणसी और इलाहाबाद से नियमित और सीधा जुड़ा हुआ है। दिल्ली के राष्ट्रीय राजमार्ग २ से पलवल, कौसी कला और मथुरा होते हुए आगरा पहुंचा जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग ३ से धौलपुर और मुरैना के रास्ते ग्वालियर जाया जा सकता है। उसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग ७५ से झांसी, मउरानीपुर और छतरपुर से होते हुए बमीठा और वहां से राज्य राजमार्ग की सड़क से खजुराहो पहुंचा जा सकता है।
धन्यवाद।
धन्यवाद।






















